लखनऊ सामूहिक दुष्कर्म: आशियाना की वो रात जिसने रूह कंपा दी

महेंद्र सिंह
महेंद्र सिंह

शहर में आंधी चल रही थी, धूल भरी हवाएं खिड़कियों से टकरा रही थीं, लेकिन किसी को नहीं पता था कि आशियाना के सेक्टर-एम में एक 13 साल की मासूम की चीखें उसी शोर में दफन की जा रही हैं। जिस उम्र में बच्चियां खिलौनों और पढ़ाई की बातें करती हैं, उस उम्र में उसे रस्सी से जकड़ दिया गया, मुंह में कपड़ा ठूंस दिया गया ताकि उसकी सिसकियाँ भी बाहर न जा सकें।

यह सिर्फ एक ‘क्राइम रिपोर्ट’ नहीं है, बल्कि उस सिस्टम के मुंह पर तमाचा है जो हर चौराहे पर सुरक्षा का दम भरता है। वह बच्ची, जो अपनी गरीबी से लड़ते हुए दूसरों के घर में बच्चों की देखरेख करती थी, उसे क्या पता था कि बाहर की दुनिया उन बच्चों की कहानियों से भी ज्यादा डरावनी है?

निर्माणाधीन मकान या ‘मौत का चैंबर’?

बिहार से आए उस मजदूर परिवार के लिए मंगलवार की शाम कभी न खत्म होने वाला एक बुरा सपना बन गई। राजमिस्त्री पिता और घरों में बर्तन मांजने वाली माँ जब अपनी बेटी को लेने पहुंचे, तो वहां सिर्फ खालीपन था। तलाश शुरू हुई, और वो तलाश खत्म हुई एक ऐसे निर्माणाधीन मकान में, जिसे देखकर पत्थर दिल इंसान भी कांप जाए।

जमीन पर बेसुध पड़ी वो मासूम, लहूलुहान कपड़े, और वो रस्सियां… जो बता रही थीं कि दरिंदगी किस स्तर की रही होगी। डॉक्टरों का कहना है कि अत्यधिक रक्तस्राव और प्राइवेट पार्ट पर गहरे जख्मों ने उसे मौत की दहलीज पर खड़ा कर दिया है। सवाल यह है कि क्या वो निर्माणाधीन मकान सिर्फ ईंट-पत्थर का ढांचा था या शहर के बीचों-बीच चल रहा एक ‘टॉर्चर सेल’?

पहचान का वो चेहरा, जो आस्तीन का सांप निकला

इन्वेस्टिगेशन में जो बात सबसे ज्यादा चुभती है, वो है ‘भरोसा’। पुलिस की शुरुआती जांच कहती है कि अगवा करने वाला कोई अनजान नहीं था, बल्कि बच्ची की पहचान का ही एक लड़का था। वही लड़का उसे बहला-फुसलाकर उस वीरान इमारत में ले गया, जहां उसके चार और ‘भेड़िये’ दोस्त पहले से ही शिकार का इंतजार कर रहे थे।

यह समाज की उस सड़ांध को दिखाता है जहां अब पड़ोसियों और जान-पहचान वालों पर भरोसा करना भी जानलेवा साबित हो सकता है। पांच लोगों ने मिलकर एक मासूम की गरिमा को तार-तार किया। क्या उन पांचों के अंदर एक पल के लिए भी अपनी बहन या मां का चेहरा नहीं आया? शायद नहीं, क्योंकि जब वासना सिर पर चढ़ती है, तो इंसानियत घुटने टेक देती है।

गुस्से का गुबार: जब कानून से पहले भीड़ ने किया इंसाफ

जैसे ही यह खबर फैली, लखनऊ का गुस्सा सड़कों पर उतर आया। पुलिस के पहुंचने से पहले स्थानीय लोगों ने घेराबंदी कर उन पांचों आरोपियों को दबोच लिया। भीड़ का इंसाफ सड़क पर ही शुरू हो गया। जमकर पिटाई हुई, चीखें निकलीं—शायद वैसी ही जैसी उस मासूम की निकली होंगी, जिन्हें किसी ने नहीं सुना था।

भीड़ का यह गुस्सा पुलिस और कानून की सुस्ती पर एक सीधा हमला है। लोग थक चुके हैं तारीखों से, लोग थक चुके हैं ‘जांच चल रही है’ वाले रट-रटाए बयानों से। हालांकि, पुलिस ने अब उन्हें हिरासत में लिया है और पॉक्सो (POCSO) एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज किया है, लेकिन क्या यह काफी है?

सियासत, पुलिस और कागजी दावे

लखनऊ उत्तर प्रदेश की राजधानी है, सत्ता का केंद्र है। यहां से कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर विधानसभा है जहां बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं। लेकिन हकीकत आशियाना के उस निर्माणाधीन मकान के फर्श पर बिखरे खून के धब्बों में छिपी है। पुलिस अब इस बात की जांच कर रही है कि आरोपी बालिग हैं या नाबालिग। कानून की बारीकियों में शायद उन्हें बचाने का रास्ता मिल जाए, लेकिन उस बच्ची का क्या जिसकी जिंदगी उजाड़ दी गई?

पॉलिटिकल एनालिस्ट की नजर से देखें तो ऐसी घटनाएं सरकार के ‘जीरो टॉलरेंस’ के दावे पर कालिख पोतती हैं। क्या पुलिस सिर्फ रसूखदारों की सुरक्षा के लिए है? या फिर गरीब मजदूर की बेटी की जान की भी कोई कीमत है?

क्या हम वाकई जागेंगे?

आज वह 13 साल की मासूम लोकबंधु अस्पताल के वेंटिलेटर पर है। उसके माता-पिता की आंखों के आंसू सूख चुके हैं, अब वहां सिर्फ शून्य है। यह घटना हमें झकझोरने के लिए काफी होनी चाहिए कि हम किस तरह के समाज का निर्माण कर रहे हैं। क्या हम सिर्फ एक और हैशटैग #JusticeFor… बनाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर लेंगे?

यह आर्टिकल खत्म हो जाएगा, आप अगला न्यूज़ स्क्रॉल करेंगे, लेकिन उस बच्ची के शरीर पर लगे घाव और उसकी रूह पर लगा दाग कभी नहीं मिटेगा। असली अपराधी सिर्फ वो पांच लड़के नहीं हैं, बल्कि वो पूरा समाज और सिस्टम है जिसने उन्हें यह हिम्मत दी कि वो एक मासूम को बंधक बनाकर घंटों तक हैवानियत कर सकें और किसी को भनक तक न लगे।

कल सुबह जब आप अपने बच्चों को स्कूल भेजेंगे, तो क्या आपकी रूह नहीं कांपेगी? क्योंकि आशियाना की वो रात चीख-चीख कर कह रही है कि राजधानी की रोशनी के नीचे अंधेरा बहुत गहरा है, और उस अंधेरे में अगला शिकार कोई भी हो सकता है।

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